Supreme Court Judgment: क्या Live-in Relationship में महिला गुजारा भत्ता (Maintenance) मांग सकती है? जानिए नया कानून

Supreme Court Judgment on Live-in Relationship Maintenance in Hindi

Supreme Court Judgment on Live-in Relationship Maintenance: आज के इस डिजिटल और आधुनिक दौर में भारत में लाइव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या बिना शादी के एक साथ रहने वाली महिला, रिश्ता टूटने के बाद अपने पार्टनर से गुजारा भत्ता (Maintenance) मांग सकती है?

हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने इस विषय पर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है, जो हर नागरिक और विशेषकर महिलाओं के लिए जानना बेहद जरूरी है। आइए इस कानून और सुप्रीम कोर्ट के लेटेस्ट जजमेंट को विस्तार से समझते हैं।


क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि अगर कोई महिला और पुरुष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह एक साथ लाइव-इन रिलेशनशिप में रहे हैं, तो रिश्ता खत्म होने पर महिला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 129 (जो पहले CrPC की धारा 125 थी) के तहत गुजारा भत्ता (Maintenance) पाने की हकदार है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल शादी का कानूनी सबूत (Marriage Certificate) न होने के आधार पर किसी महिला को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अगर उनके बीच का संबंध समाज की नजर में विवाह जैसा ही था, तो महिला को पूरा कानूनी संरक्षण मिलेगा।


Live-in Relationship में गुजारा भत्ता मिलने की शर्तें

कानून के मुताबिक, हर लाइव-इन पार्टनर को मेंटेनेंस नहीं मिल सकता। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act, 2005) के तहत कुछ शर्तें तय की गई हैं:

  • लंबे समय तक साथ रहना (Long Duration): कपल सिर्फ कुछ दिनों या हफ्तों के लिए साथ न रहा हो, बल्कि समाज की नजर में वे लंबे समय से पति-पत्नी की तरह रह रहे हों।
  • शादी की कानूनी उम्र: दोनों पार्टनर बालिग (Major) होने चाहिए और कानूनन शादी करने योग्य होने चाहिए।
  • मोनोगेमी (Monogamy): रिलेशनशिप के दौरान दोनों में से कोई भी पहले से शादीशुदा नहीं होना चाहिए। अगर पुरुष पहले से शादीशुदा है और अपनी पत्नी को बिना तलाक दिए किसी अन्य महिला के साथ रहता है, तो उस महिला को लाइव-इन के तहत गुजारा भत्ता मिलने में कानूनी अड़चन आ सकती है।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम का संरक्षण: डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट की धारा 2(f) के तहत लाइव-इन रिलेशनशिप को 'विवाह की प्रकृति का संबंध' (Relationship in the nature of marriage) माना गया है।

नये कानून (BNSS) और पुराने कानून (CrPC) में क्या बदला?

भारत में नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद से अब कोर्ट में पुराने सेक्शंस की जगह नए सेक्शंस के तहत केस दर्ज होते हैं। इसे आप नीचे दी गई टेबल से समझ सकते हैं:

विषय पुराना कानून (CrPC) नया कानून (BNSS)
भरण-पोषण / गुजारा भत्ता धारा 125 CrPC धारा 129 BNSS
घरेलू हिंसा से संरक्षण DV Act, 2005 DV Act, 2005 (यथावत)

बच्चों के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह भी साफ किया है कि लाइव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे पूरी तरह से वैध (Legitimate) माने जाएंगे।

  • ऐसे बच्चों को अपने पिता की संपत्ति में पूरा कानूनी अधिकार मिलता है।
  • पिता कानूनी रूप से बाध्य है कि वह लाइव-इन से पैदा हुए बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा का खर्च उठाए।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है जो किसी कारणवश बिना शादी के एक लंबे रिश्ते में रहती हैं और बाद में उन्हें बेसहारा छोड़ दिया जाता है। भारतीय कानून अब केवल कागजी शादियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह व्यावहारिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर न्याय सुनिश्चित करता है।


FAQ: लाइव-इन रिलेशनशिप और गुजारा भत्ता से जुड़े जरूरी सवाल

Q1. क्या 2-3 महीने साथ रहने पर भी गुजारा भत्ता मांगा जा सकता है?
उत्तर: नहीं, कोर्ट के अनुसार 'वॉक-इन और वॉक-आउट' रिलेशनशिप या कुछ दिनों के शॉर्ट-टर्म अफेयर को लाइव-इन रिलेशनशिप के तहत भरण-पोषण का आधार नहीं माना जा सकता।

Q2. लाइव-इन में रहने वाली महिला किस कोर्ट में केस कर सकती है?
उत्तर: पीड़ित महिला अपने नजदीकी फैमिली कोर्ट (Family Court) या मजिस्ट्रेट की अदालत में घरेलू हिंसा अधिनियम और BNSS की धारा 129 के तहत आवेदन कर सकती है।

Q3. क्या पुरुष भी महिला से गुजारा भत्ता मांग सकता है?
उत्तर: हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में पति पत्नी से मेंटेनेंस मांग सकता है, लेकिन लाइव-इन रिलेशनशिप और डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट के तहत यह अधिकार केवल महिलाओं को ही दिया गया है।


Disclaimer: यह लेख केवल शैक्षणिक और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी कानूनी समस्या के लिए कृपया अपने नजदीकी किसी प्रमाणित वकील (Advocate) से परामर्श लें।

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